रविवार, 25 फ़रवरी 2007

कुछ शेर पेश-ए-ख़िदमत हैं - २

प्यारे दोस्तों,
हम हैं अभिषेक पाण्डेय 'बनारसी' । आप थोड़ी ज़्यादा इज़्ज़त देना चाहें तो पाण्डेय जी 'बनारस वाले' भी पुकार सकते हैं । इस ब्लॉगजगत मे हम (वो क्या कहते हैं कि) न्यूबी हैं, यानि कि नवागन्तुक हैं, नौनिहाल हैं । ये तो नारद मुनि की कृपा थी कि हमारा ब्लॉग भी लोगों के पास पहुँच गया और लोग पढ़ने भी लगे । पिछली पोस्ट से मिली हौसलाफ़ज़ाई के लिये हम बड़े ही शुक्रगुज़ार हैं और आपके लिये लेकर आये हैं ये नया कलेक्शन ।

पिछली बार के मेरे सारे शेर बड़े पॉज़िटिव थे, सकारात्मक थे । लेकिन ये भी कोई बात हुई ? जब तक मोहब्बत की बात ना हो, दिल के दर्द की बात ना हो, साक़ी, जाम और मैख़ाने की बात ना हो, तब तक कैसा शेर ? इसीलिये इस बार कुछ ऐसे शेर लाया हूँ जो मोहब्बत की बात करते हैं ।

मोहब्बत... सबकी तरह हमने भी कभी की थी... कुछ ना हुआ उसका... लेकिन-

क़सूर ना उनका है ना मेरा
हम दोनो ही रिश्तों की रस्मे निभाते रहे
वो दोस्ती का एहसास जताते रहे
हम मोहब्बत को दिल मे छुपाते रहे ॥

हम अफ़सोस करें भी तो कैसे... क्योंकि-

मोहब्बत हो गयी जिनसे, शिक़ायत उनसे क्या होगी
ज़ुबाँ तक बात जो आयी, यक़ीनन वो दुआ होगी ॥

और कोई जो ये पूछे कि कौन हैं वो, कुछ बताओ तो सही... तो मै तो बस यही कहूँगा कि-

मुस्क़ुराते हैं तो बिजलियाँ गिरा देते हैं
बात करते हैं तो दीवाना बना देते हैं
हुस्न वालों की नज़र कम नही क़यामत से
आग पानी मे वो नज़रों से लगा देते हैं ॥

अपनी मोहब्बत के बाबत हमने उनसे कहा भी कि-

बिखरी हुई ज़ुल्फ़ों को ग़िरहगीर बना लो
रखना है मुझे क़ैद तो ज़ंजीर बना लो
क़ागज़ पे लकीरें तो बहुत खींच लीं तुमने
अब सबको मिलाकर मेरी तस्वीर बना लो ॥

लेकिन उनको मेरी तस्वीर बनाने का वक़्त कहाँ ?
ख़ैर ऐसे ज़ुल्म-ओ-सितम के लिये तो हम पहले से ही तैयार थे । हमारी तो निग़ाह ही बदल गयी थी-

ना हमने बेरुखी देखी न हमने दुश्मनी देखी
तेरे हर एक सितम मे हमने कितनी सादगी देखी
कभी हर चीज़ मे दुनिया मुकम्मल देखते थे हम
कभी दुनिया कि हर एक चीज़ मे तेरी कमी देखी
न दिन मे रोशनी देखी न शब मे चान्दनी देखी
तेरी उल्फ़त मे हमने इस कदर भी ज़िन्दगी देखी
वो क्या अहद-ए-वफ़ा देंगे वो क्या गम की दवा देंगे
ज़िन्होने देख कर भी इश्क़ मे जन्नत नही देखी
यहाँ हम दिल जलाकर के किया करते है श़ब रोशन
वहाँ एक तुम हो जिसने देखी भी तो आग़ ही देखी
'क़सक' हर बार सोचा है ग़िला करना न भूलेंगे
मगर हर बार भूले हैं वो आँखें जब भी नम देखीं ॥

बस अब ज़्यादा क्या बताएँ, हमारी मोहब्बत का फ़साना इससे बड़ा कुछ है भी तो नही-

मासूम मोहब्बत का बस इतना फ़साना है
काग़ज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है
क्या शर्त-ए-मोहब्बत है क्या शर्त-ए-फ़साना है
आवाज़ भी ज़ख़्मी है और गीत भी गाना है
उस पार उतरने की उम्मीद बहुत कम है
कश्ती भी पुरानी है तूफ़ान भी आना है
समझे या ना समझे वो अंदाज़-ए-मोहब्बत को
एक शख़्स को आँखों से हाल-ए-दिल सुनाना है
मासूम मोहब्बत का बस इतना ही फ़साना है
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है ॥

जाने कितना वक़्त गुज़र गया पर हम अभी भी उनके लिये यही सोचा करते हैं कि-

ये नज़रें भी कितनी मग़रुर हैं
इनको बस आइना देखते रहना है
और हम जो तरसते थे इक नज़र के लिये
आज आँसू बनकर हमे बहना है
फ़ुरसत जब मिले तो याद हमे भी करना
चलते चलते बस यही कहना है............


आदाब अर्ज़ है



[वही पुराना वाला डिस्क्लेमर: अगर किसी दोस्त को लगता है कि यहाँ किसी तरह का कॉपीराइट हनन हो रहा है (मसलन किसी के लिखे शेर बिना इज़ाजत छापे गये हैं) तो मुझे फ़ौरन बताएं, मै उनको तुरन्त हटा लूंगा । ]

3 टिप्‍पणियां:

Neeraj Rohilla ने कहा…

पान्डेयजी बनारस वाले,

आपके इस अंदाजे बयाँ के तो हम कायल हो गये, कहीं दिल तो नहीं लगा बैठे हो? आपकी पोस्ट पढकर एक शेर याद आया है:

थी खता उनकी मगर जब आ गये वो सामनें,
झुक गयीं मेरी भी आँखे रस्म-ए-उल्फ़त देखिये ।

वैसे हमारी छ्पास पीडा भी निकल पडी है, आज ही एक पोस्ट लिखी है । अब कम से कम आपको तो झेलना ही पडेगा ।

http://antardhwani.blogspot.com

धन्यवाद,

manya ने कहा…

कफ़ी अच्छे शेर हैन और दास्तान-ए-मोहब्बत भी.. क्या कहने.. और हां मेरी सारी रचनाय़ें स्व-रचित हैं.. सिर्फ़ एक को छोङ्कर "some quotes.. i like"

शशि सिंह ने कहा…

का गुरू... तू त मर्दवा हमरे बनारस के याद दिले हो... स्वागत है हिंदी ब्लॉगजगत में.